Sunday, May 12, 2019

तरक़्क़ी और सुविधा भरा जीवन

घर में सुख सुविधाएं भरपूर हैं
दूरभाष ने दूरिओं मिटा दी भरपूर हैं
सात समुन्दर पार झट से सम्पर्क बना है
घंटो वार्तालाप हुआ दिल सूना का सूना रह गया
खुशबूदार गुलाबी खतों का सिलसिला बंद हुआ
समय कम और दिल की दूरियाँ लम्बी हो गईं
ख़त में लिखे शब्द दिल के तार छेड़ छेड़ जाते थे
डाकिये के इंतजार में नयन बिछ बिछ जाते थे
किताबों में दबे सूखे फूल रातों की नींद उड़ा जाते थे
वो कोमल भावनाएँ हमारी तरक़्क़ी को भेंट हो गईं

शादी ब्याह, मुंडन , उपनयन , वर्षगांठ में ढोलक की थाप नहीं सुनने को मिलती है
सप्ताहों की तैयारी , हलवाई का आँगन में डेरा जमाने का समय नहीं रहा है
आपसी हंसी ठिठोली की जगह डीजे ने ले ली है
गली मुहल्ला मिलकर जो रौनक लगाता था
वो गलियाँ सूनी हो गईं बड़े पॉँच सितारा होटल सजे पड़े हैं
ख़ुशी के अवसर तो ढेरों आते हैं
पर उत्साह और उल्लास की भावनाएँ लुप्त हो गईं है

टीवी ,अन्तरजाल , वेब बैठक की शान बने हैं
दुनिया के हर कोने की ख़बर मिल जाती है
ज्ञान के हर प्र्शन का उत्तर गूगल मास्टर से मिल जाता है
लेकिन कोई गूगल आपको आपके परिवार के सदस्यों का हाल नहीं बता सकता है
सारी सुख सुबिधा जुटाने में परिवार इतना व्यस्त है कि किसी के पास दूसरे के लिए समय नहीं है
घर बना लिया तो छुट्टियाँ बिताने के लिये समुन्दर के किनारे एक शिकारा चाहिए
गाड़ी चाहिए , गाड़ी है तो हवाईजहाज़ चाहिए
चाहिए चाहिए सब कुछ चाहिए

हर सुविधा पाने की होड़ में हमारे बच्चों  का रसभरा बचपन बीत गया
लेकिन हम उनको  ऊँगली पकड़ कर चला नहीं पाए
उनके साथ बैठ कर उनकी तोतली बोली नहीं सुन पाए
और वो कब घर की दलहीज पर जवान हो गए गूगल को भी नहीं मालूम
प्यार और संवेदना रहित माहौल में पले इन बच्चों से आपने सारी सुविधायें देकर भी कुछ नहीं दिया
अपना समय , अपना दुलार दादी नानी की थपकियाँ नहीं दी
बचपन को रंगीन करने वाली पुस्तकें नहीं दी
नानी दादी की संस्कार भरे आँचल की छाँव नहीं दी
इस माहौल में पले बच्चे आपको वही देंगे जो आपने उन्हें दिया
भावनाहीन, भौतिकवादी , व्यवहारिक सब आज जी रहें है

आपकी जवानी की उत्साह भरी शामें नोट गिनने में गुजर गईं
ऑंगन में प्रेम की कितनी बरसते हुईं पर आप  रीते ही रह गए।
वक्त गुजर गुजर कर हाथ से छू मंतर हुआ गूगल को भी पता नहीं चला

झाड़ू बुहारना , कपड़े धोना , सब मशीन ने सुलभ कर दिया
व्यायाम करने  वाला हर काम मशीन करती है क्योंकि कसरत के लिए जिम है
बढ़ा हुआ वज़न किस जिम में कम होगा ये गूगल को भी नहीं मालूम है

कुकर सीटी बजा बजा कर दाल पका देता है
माइक्रोवेव चावल , सब्ज़ी सब पल में ही बना देता है
लेकिन भोजन में वोह जायका और पौष्टिकता कहाँ जो चूल्हे की धीमी आँच पर पकी दाल में है
तरक़्क़ी  से आपको मिली सुविधाएँ बेशुमार है
इस तरक़्क़ी की कीमत  चुकाते चुकाते आपने अपने दिमाग़ और समय का उपयोग किया
लेकिन आपके दिल की भवनाएँ कब सुप्त हो गईं यह गूगल को भी पता नही चला
तरक़्क़ी ने सुविधा जीवन में भर कर आपकी भावनाओं का सौदा बड़े महंगे में किया है


Saturday, March 9, 2019

दादी नहीं सुनाती दीवाली की कहानी 
 

दादी नहीं सुनाती दीवाली की कहानी 

क्योंकि नहीं देखने को मिलती चारों भाईओं की जोड़ी किसी भी घर में अब 

अटूट प्रेम का बंधन टूटा , हार-जीत की होड़ लगी है सबमें 

मंथरा की कूटनीति की कुटिलता दिखती है हर घर में 

कैकई की डाह जल रही है हर घर मेँ, हर गली मेँ 

लेकिन कहीं कहीं ही मिलती है कौशल्या और सुमित्रा माता की ममता की छईयाँ 

स्वार्थों के घेरे मेँ बंध कर दम तोड़ रहें हैं सब रिश्ते प्यारे 

भगवान राम बनवास जाने को तैयार खड़े हैँ न्यारे 

पर नहीँ दिखती है कहीँ पर भी लक्ष्मण की निष्ठा और भक्ति प्यारे 

सीता सहते-सहते थक गई है और बनवास से पहले ही अलग हुई है अपने \
 
प्यारे राम से 

दादी नहीं सुनाती दीवाली की कहानी 

क्योँकि राम लक्ष्मण -सीता की कोई भी एक जोड़ी बनवास से लौट कर 
 
अयोध्या की ओर नहीं आती 

आस देखती बैठी है अब दादी 

दादी नहीं सुनाती दिवाली की वही पुरानी कहानी अब

दादी लिखेगी एक नयी कहानी दिवाली की अब

देगी सीता को एक नई पहचान वो अब

खड्ग , खप्पर धार कर सीता लेगी एक नया रूप अब

वोह बनेगी दुर्गा , चंडी और महाकाली अब

नहीं करेगी अनुगमन अपने राम का अब

बनाएगी अपने लिये नयी राहें वो अब

अपने चारों और पनपने वाले हर रावण का संहार करेगी स्वयं वो अब

नहीं तकेंगी राह वो किसी मर्यादा पुरूषोत्तम राम के आने की अब

क्योंकि नहीं मंजूर उसे  हर युग में बार बार किसीअग्नि परीक्षा से गुजरना

पालनहारी , सृजनकारी शक्ति रूपिणी , दुर्गा , काली, नारी अब किसी 

अपमान सहने के लिए बेबस या लाचार नहीं है 
मेरे वीर को आ जानेदे बाबुल 
मेरे वीर को आ जाने दे बाबुल 

रोक ले एक दिन डोली कहारों

कितना कुछ है कहना तुमको वीरा

तुम्हारी आने की राह तकती थकती अखीआं

बचपन के नेह से भीगे पल

फिर एक बार आज संग जी लें

वो छत पर कागज़ के जहाज़ उड़ाना

उड़ते जहाजों संग बिखर जाते थे हमारे सपने हवा में

आओ आज जाने से पहले बताऊँ तुम्हें कितने सपने सच हुए हमारे

आज विदा हुई जो बहन तुम्हारी

हो जायेगी फ़िर पराई

ना यह घर उसका अपना होगा ना यह आंगन कल

इस आँगन में बैठ कर अपना बचपन आँचल में पिरो लेने दो मुझे  

मोटे मोटे उपन्यास पढ़ कर खत्म करने की होड़ में रात रात भर जागना

सुबह अख़बार के साथ चंदामामा, पराग , धर्मयुग और अन्य पत्रिकायें  

पहले लपक लेने 

की होड़ में सीढ़ियों में छूप छूप कर बैठना 

उन रंग बिरंगी पत्रिकाओं की कहानिओं में खो जाना 

पिताजी के पूछने पर एक दूसरे के ज्ञान अज्ञान की खिल्ली उड़ने पर 

एक दूसरे के आंसू पोछना याद करलें आज

हाथ में हाथ थाम कर चाट के ठेलों पर जाना

तीख़ी चाट चटनी चाट चाट कर खाने के बाद चाट वाले से मीठा लड्डू   

माँगना

 लड्डू के साथ उसका झिड़कना और हमारा खिल खिल कर हँसना

आओ वो पल फिर से जी लें

डाकिए का इंतजार करना

मौसी के  अंतरराष्ट्रीय पत्र के साथ विदेशी डाक टिकट पाने की ख़ुशी

  होली आने से पहले रात को तुम्हारे लिये पिचकारिओं में रंग भरना

रात जाग कर तुम्हारे लिये  मंगल कामना करना  

भाईदूज में अपने हाथोँ बनी मिठाई खिला कर नेग में मिले पैसों से सिनेमा 

देखने जाना

पैंट की क्रीज़ बिगड़ने पर तुम्हारा नाराज़ होना और फ़िर चाट खिला कर 

रूठी बहन को मनाना 

ससुराल में सास की झिड़किओं बीच बहुत याद आयेगा 

आओ उन पलों को एक बार फिर से जी लें

नवरात्री में रात को नंगे पावं मंदिर में जाना  

पूजा अर्चना के बाद प्रसाद ज्यादा पाने की होड़ में कतार में धक्का मुक्की 

करना

पिताजी के साथ तोता उड़ , कौआ उड़ खेलते खेलते भैंस उड़ाना

आऔ उन खिलखिलाते पलों को याद कर फिर एक बार खिलखिला लें

गर्मी की दुपहरी में लूडो और ताश के खेल में हारने पर

 मटके के पानी से सबके लिये निम्बू पानी बनाना

उस सज़ा में भी एक मजा था उसमें हार का गम नहीं था

पर आज बार -बार पुकारने पर भी तुम्हारे ना आने का गम बहुत अधिक है

Friday, October 26, 2018


तलाश गुमशुदा की 
   बात उन दिनों की है जब मैं दो साल की उम्र में घर से लापता हो गई थी |  मेरा लालन पालन एक हिन्दू संयुक्त परिवार में हुआ था। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में तार घर के पीछे नवाब के हाते में हमारा तीन मंजिला मकान था। हमारे हाते में हिन्दू और मुस्लमान दोनों ही परिवार रहते थे त्यौहारों में क्या मज़े की रौनक होती थी। किसी छत पर दिवाली के दिये जल रहें थे  तो कंही ईद मुबारक़ का शोर गूँजता था कंही मुहर्रम का जलूस निकल रहा था तो कंही रामलीला की झाँकी, कंही बसंत के लिये कपड़ों को पीले रँग से रंगा जा रहा था तो कंही मुहर्रम के लिये हरे रंग से। मज़ा तो तब आता जब धोबी पीले की जगह हरा या फिर हरे की जगह पीला रंग कर देता था। दोनों परिवार बाहर आकर खूब ज़ोर ज़ोर से अपनी गलती दूसरे पर थोपने में लग जाते और धोबी चुपचाप ग़ायब हो जाता था ।
     तारघर के बांयी ओर रिज़र्व बैंक है जहाँ मेरे पिताजी और चाचाजी काम करते थे, और दाईं ओर द्वारिकाधीश का मन्दिर स्थित है। हाते के अंतिम छोर पर एक मस्जिद है जहाँ से अज़ान की आवाज़ पूरे हाते में गूँजती  है घर में मेरे साथ मेरे भाई बहन और माता पिता के अलावा तीन चाचा-चाची सपरिवार रहते थे। हम सब  पूरे चौबीस बच्चे थे और हर वक्त धमा चौकड़ी मचा रखते थे
       बात उन दिनों की है जब मैं दो साल की थी और अभी चल नहीं पाती थी हालाँकि मेरी हम उम्र के दो चचेरे भाइयों ने चलना शुरु कर दिया था वो सब मेरा  मज़ाक उड़ाते थे। मैं सारा दिन शांति से खिड़की पर बैठी  सड़क पर आने जाने वालों की चहल पहल में मग्न रहती थी। सारा दिन गली में कोई ना कोई ठेले वाला आता जाता रहता था।  कोई सब्जी बेच रहा है तो कोई आइसक्रीम। मुझे उनका ऊँचे सुर में गुहार लगाना बड़ा ही मधुर लगता था। कभी कभी खिनी मेवा फालसा बेचने वाला आता तो मम्मी शर्बत बनाने के लिये फालसा ज़रूर लेती थी। मुझे तराज़ू के बाँट बड़े अच्छे लगते थे जी चाहता था कि उनको हांथों से छू कर देखूं की वज़न कैसा नापा जाता है? पर मैं तो चल नहीं पाती थी और किसी ने मुझे चलना सिखाया भी तो नहीं था। मुझे समय पर खाना पीना मिल रहा था सो मेरा शांति से बैठे रहना और ना चल पाना किसी को अखर नहीं रहा था। 
 गर्मियों का मौसम था और दोपहर को भोजन  के बाद आम खाने का दौर चलता  था सुबह पानी की बाल्टी में सबके लिये एक एक दशहरी आम भिगो दिया जाता था। आम को हम सब चूस चूस कर खाते और गुठली स्वाद लेकर चूसते। किसने कितनी अच्छी तरह गुठली साफ़ की उसकी पीठ थपथपाई जाती क्योंकि साफ़ गुठली को बगीचे में बो दिया जाता था। आम खाने का समय आया तब मेरी चचेरी बहन सुरेखा ने सबको आम बाँटे एक आम बच गया। बचे हुए आम से सबको मालूम हुआ कि घर में एक बच्चा कम है। सबको नाम लेकर पुकारा गया तब पता चला कि नीना ग़ायब  है। सबने कहा, “अरे देखो, खिड़की पर बैठी होगी।घर के सारे सदस्य खोज  में जुट गए।
       
लेकिन मेरे पैरों में शायद उसी दिन पंख लग गये।  मैं घर से निकल कर चलते चलते गली में पहुँची। मैंने आज़ सब्ज़ी वाले के ठेले पर रखे वज़न को छूने की इच्छा पूरी करने की ठानी। उस इच्छा के आवेग में मैंने कैसे सीढ़िया पार की और गली में आ पहुंची मुझे एहसास भी नहीं हुआ।  लेकिन यह क्या? सब्जी का ठेला तो कंही नज़र ही नहीं आ रहा।  एक बकरी मुर्गी के पीछे भाग रही थी , मुर्गी कुकड़ूं कडूं करती हुई मेरी ओर ही आ रही थी। अरे ! अरे! मैं थोड़ा चल कर पीछे हट गई। चलने पर पैर में कुछ कंकड़ से चुभे तो एहसास हुआ की मेरे  तो पैरों में चप्पल भी नहीं है, तब बरबस ही मेरी आँखों में आँसू आ गए।
अकेली बच्ची को गली में रोते  देख कर एक  लम्बी  सफ़ेद दाढ़ी वाले बुज़ुर्ग मेरी ओर बढ़े मैं थोड़ा डरी। मुझे डरता देख करवो  मुसकराये और बोले ," डरो नहीं बेटा , मैं यहाँ का मौलवी हूँ।  तुम रोना बंद करो। "
उनकी मुस्कान से मेरा डर कुछ कम हुआ लेकिन मेरा रोना बंद नहीं हुआ।
मेरी मम्मी मुसलमानों के मुहल्ले में रहने के बावजूद भी हमेशा उनसे दूर ही रहती थीं। बँटवारे के दौरान उन्होने अपनी आँखों से जो कत्ल--आम देखा था उसकी दहशत अब तक उनके मन में थी। इसी कारण वह मुसलमानों के प्रति उदासीन-सी थीं।अनजान आदमी को अपनी  ओर आते देख क़र मेरा डरना स्वभाविक था 
मौलवी साहब मुझे अपने घर ले गए। मेरा रोना सुनकर मौलवीजी की पत्नी _दौड़कर बाहर आई | उन्होनें हरी ओढ़नी पहनी थी उन्होंने मुझे बड़े प्यार से अपनी गोदी में ले लिया और मेरे आँसू पोंछे फ़िर चम्मच से सेवैयाँ खिलाईं। कुछ देर बाद मौलवी साहब वापस गली में गए। उनको समझ में नहीं रहा था कि मैं किस घर में रहती हूँ मोहल्ले में किसी ने मेरा चेहरा पहले नहीं देखा था। इतने में मेरे पिताजी घबराए हुए इधर उधर धूमते हुए दिखाई दिये तब मौलवी साहब ने मुझसे पूछा, “बेटी देखो तो, यह कौन हैं?“ मैं चिल्ला कर पिताजी की ओर भागी। मुझे  अपने पैरों पर खड़ा देख  पिताजी खुशी के मारे यह भी भूल गए कि सारा घर मुझे ढूँढ- ढूँढकर परेशान  है।मौलवी जी ने मुझे पिताजी के पास जाते देखा तो उनकी साँस में साँस आई।  पिताजी मेरी ऊँगली पकड़ कर घर की ओर बढ़े मुझे देख कर मम्मी बहुत खुश हुईं।  मेरे गुम हो जाने और मुसलमान के घर से बरामद होने के कारण उनका दृष्टिकोण  हमेशा के लिए बदल गया। उस दिन के बाद से मौलवी साहब और उनके परिवार से हमारी दोस्ती हो गई हर साल ईद के दिन शबाना आंटी सेवैयाँ बना कर भेजती थीं और हर दिवाली में मौलवी जी सपरिवार हमारे घर आते

आज मैं इस घटना के बारे में विचार करती हूँ तो लगता है कि अंग्रेज़ों ने कूटनीति से तो एक बार में एक पाकिस्तान बनाया था लेकिन हम लोग अपने संकुचित दृष्टिकोण और संकीर्ण व्यवहार से अपने चारों तरफ रोज ही और कितने पाकिस्तान बनाते रहते हैं।
Posted by neeshi at 10:20 PM