मसालों की जंग
नमक अपने सफ़ेद रंग पर इतरा रहा है अकड़ अकड़ कर सबको दूर भगा रहा है
हल्दी के पीलेपन से घबड़ा रहा है
काली मिर्ची की कालिमा को देख गुर्रा रहा है
लाल मिर्च की लालिमा से द्वेष में जल रहा है
अपना ही अस्तित्व बचाने ही होड़ में सब लड़ पड़े हैं
मसालों ने आपस में घोर जंग छेड़ दिया है
द्वार पर बैठा अतिथि इस जंग से चिँतित सोच रहा है
यह तो आज उपवास का ही अन्देशा लग रहा है
चतुर गृहिणी पाक घर के शासन की बागडोर को संभालने को सुयोग्य है
मसालों के रोज़ रोज़ के इस जंग से त्रस्त्र हो रही है
सबको सबक सिखाने की ठान रही है
कहती है
रंग भेद की जंग जो तुमने छेड़ी है आज अनजान नहीं हूँ मेँ उससे
रंग भेद की जंग तो सदियों से चली आ रही है
इसका तो अब अंत मैँ अपने ही पाक गृह में आज कर दूँगी
चेतावनी है तुम सबको बंद कर दो यह सदिओं का झगड़ा आज
क्योंकि झगड़े से आज तक जीता नहीं कोई
कितने ही सिकन्दर आये
कितने ही हिटलर दफ़न हुऐ
दुश्मन के नाम अनेक हैं मकसद वो ही पुराना
अपने ही घर में दहशत फैलाना
मुझको अपने पाक गृह में यह झगड़ा आज ही निपटाना है
चेतावनी है तुम सबको बंद कर दो यह सदिओं का झगड़ा आज
वरना खौलते हुऐ तेल में, उबलते पानी में किसका रंग, किसका आस्तित्व कब और कितना नष्ट हो जाये
इस बात की जानकारी मुझे भी नहीं है
क्योंकि रक्षक बन कर या ताकतवर बनकर जो वार तुम आज अपने सामने वाले पर कर रहे हो
उसकी ओर से एक दिन तीन वार तुमपर भी होने निश्चित हैं
क्योंकि प्रकृति अपना सन्तुलन खुद ढूँढ लेती है
हिंसा की प्रतिध्वनि हिंसा ही होगी
अपना अस्तित्व और उतपत्ती को कभी ना भूलना
सब रंगो के मिलने से ही एक सफ़ेद किरण की उत्पत्ति होती है
फ़िर सफ़ेद रंग अपने ही उदभाव को कैसे भूल कर अकड़ दिखा रहा है
अकड़ तो रावण की भी नहीं रही
फिर तुम रंगो की क्या बिसात
हमेशा याद रखो
अपना अस्तित्व और उतपत्ती को कभी ना भूलना
जिस मेल मिलाप से तुम्हारी उत्पत्ति हुई है वही मेल मिलाप तुम्हारे लिये ज़रूरी है
फिर क्यों नहीं लेते तुम प्यार से काम
प्यार प्रेम और मेलजोल ही तुम्हारा अस्तित्व बचाने का एकमात्र रास्ता है
मसालों ने आपस में घोर जंग छेड़ दिया है।
1 comment:
Recited on Subdrift
Recited on Diwali Eid Dinner on 10/17/2017
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