Saturday, March 9, 2019

दादी नहीं सुनाती दीवाली की कहानी 
 

दादी नहीं सुनाती दीवाली की कहानी 

क्योंकि नहीं देखने को मिलती चारों भाईओं की जोड़ी किसी भी घर में अब 

अटूट प्रेम का बंधन टूटा , हार-जीत की होड़ लगी है सबमें 

मंथरा की कूटनीति की कुटिलता दिखती है हर घर में 

कैकई की डाह जल रही है हर घर मेँ, हर गली मेँ 

लेकिन कहीं कहीं ही मिलती है कौशल्या और सुमित्रा माता की ममता की छईयाँ 

स्वार्थों के घेरे मेँ बंध कर दम तोड़ रहें हैं सब रिश्ते प्यारे 

भगवान राम बनवास जाने को तैयार खड़े हैँ न्यारे 

पर नहीँ दिखती है कहीँ पर भी लक्ष्मण की निष्ठा और भक्ति प्यारे 

सीता सहते-सहते थक गई है और बनवास से पहले ही अलग हुई है अपने \
 
प्यारे राम से 

दादी नहीं सुनाती दीवाली की कहानी 

क्योँकि राम लक्ष्मण -सीता की कोई भी एक जोड़ी बनवास से लौट कर 
 
अयोध्या की ओर नहीं आती 

आस देखती बैठी है अब दादी 

दादी नहीं सुनाती दिवाली की वही पुरानी कहानी अब

दादी लिखेगी एक नयी कहानी दिवाली की अब

देगी सीता को एक नई पहचान वो अब

खड्ग , खप्पर धार कर सीता लेगी एक नया रूप अब

वोह बनेगी दुर्गा , चंडी और महाकाली अब

नहीं करेगी अनुगमन अपने राम का अब

बनाएगी अपने लिये नयी राहें वो अब

अपने चारों और पनपने वाले हर रावण का संहार करेगी स्वयं वो अब

नहीं तकेंगी राह वो किसी मर्यादा पुरूषोत्तम राम के आने की अब

क्योंकि नहीं मंजूर उसे  हर युग में बार बार किसीअग्नि परीक्षा से गुजरना

पालनहारी , सृजनकारी शक्ति रूपिणी , दुर्गा , काली, नारी अब किसी 

अपमान सहने के लिए बेबस या लाचार नहीं है 
मेरे वीर को आ जानेदे बाबुल 
मेरे वीर को आ जाने दे बाबुल 

रोक ले एक दिन डोली कहारों

कितना कुछ है कहना तुमको वीरा

तुम्हारी आने की राह तकती थकती अखीआं

बचपन के नेह से भीगे पल

फिर एक बार आज संग जी लें

वो छत पर कागज़ के जहाज़ उड़ाना

उड़ते जहाजों संग बिखर जाते थे हमारे सपने हवा में

आओ आज जाने से पहले बताऊँ तुम्हें कितने सपने सच हुए हमारे

आज विदा हुई जो बहन तुम्हारी

हो जायेगी फ़िर पराई

ना यह घर उसका अपना होगा ना यह आंगन कल

इस आँगन में बैठ कर अपना बचपन आँचल में पिरो लेने दो मुझे  

मोटे मोटे उपन्यास पढ़ कर खत्म करने की होड़ में रात रात भर जागना

सुबह अख़बार के साथ चंदामामा, पराग , धर्मयुग और अन्य पत्रिकायें  

पहले लपक लेने 

की होड़ में सीढ़ियों में छूप छूप कर बैठना 

उन रंग बिरंगी पत्रिकाओं की कहानिओं में खो जाना 

पिताजी के पूछने पर एक दूसरे के ज्ञान अज्ञान की खिल्ली उड़ने पर 

एक दूसरे के आंसू पोछना याद करलें आज

हाथ में हाथ थाम कर चाट के ठेलों पर जाना

तीख़ी चाट चटनी चाट चाट कर खाने के बाद चाट वाले से मीठा लड्डू   

माँगना

 लड्डू के साथ उसका झिड़कना और हमारा खिल खिल कर हँसना

आओ वो पल फिर से जी लें

डाकिए का इंतजार करना

मौसी के  अंतरराष्ट्रीय पत्र के साथ विदेशी डाक टिकट पाने की ख़ुशी

  होली आने से पहले रात को तुम्हारे लिये पिचकारिओं में रंग भरना

रात जाग कर तुम्हारे लिये  मंगल कामना करना  

भाईदूज में अपने हाथोँ बनी मिठाई खिला कर नेग में मिले पैसों से सिनेमा 

देखने जाना

पैंट की क्रीज़ बिगड़ने पर तुम्हारा नाराज़ होना और फ़िर चाट खिला कर 

रूठी बहन को मनाना 

ससुराल में सास की झिड़किओं बीच बहुत याद आयेगा 

आओ उन पलों को एक बार फिर से जी लें

नवरात्री में रात को नंगे पावं मंदिर में जाना  

पूजा अर्चना के बाद प्रसाद ज्यादा पाने की होड़ में कतार में धक्का मुक्की 

करना

पिताजी के साथ तोता उड़ , कौआ उड़ खेलते खेलते भैंस उड़ाना

आऔ उन खिलखिलाते पलों को याद कर फिर एक बार खिलखिला लें

गर्मी की दुपहरी में लूडो और ताश के खेल में हारने पर

 मटके के पानी से सबके लिये निम्बू पानी बनाना

उस सज़ा में भी एक मजा था उसमें हार का गम नहीं था

पर आज बार -बार पुकारने पर भी तुम्हारे ना आने का गम बहुत अधिक है