Sunday, March 22, 2009

कान्हा के साथ मैने भी खेली होली

वृन्दावन की कुंज गली थी


फागुन की एक अनमोल घड़ी थी

राधा की चोली हरी थी मन में आस भी बड़ी थी

कान्हा की पिचकारी भरी थी टेसूओं के रंग से सजी थी

न्यनों में चंचलता भरी थी

सखियाँ खड़ी थीं हँसी थी ठिठोली थी

अबीर गुलाल से थाली सजी थी

पवन की अठखेलियों से राधा का आंचल जो जरा ढलका,

कान्हा का हाथ भी तब फिसला

राधा की चोली कान्हा के रंग में रंगी थी

लाल गुलाल से मांग भरी थी।

लाज से पलकें भी झुकीं थी दोनों की आस फली थी

सखिओं की मण्डली जुड़ी थी

हंसी और ठिठोली भी जमी थी

मैने भी खेली ऐसी एक होली थी।

सपने में कान्हा से जब मैं मिली थी

मैने भी ऐसी एक होली खेली थी जहाँ प्रेम की बौझार पड़ी थी

अनेक रंगों की टोली मिलाप बनी थी

नफरत नहीं थी दुश्मनों की टोली नहीं थी

प्रेम की बौझार पड़ी थी

नफरत नहीं थी दुश्मनों की टोली नहीं थी

होली वही थी होली वही है

वही होली है वही होली मुबारक हो सबको


1 comment:

neeshi said...

मैंने यह कविता न्यूयॉर्क में होली के उपलक्ष्य में आयोजित कवि सम्मेलन में मार्च दस दो हज़ार बारह को पढ़ी थी